सांडों की लड़ाई बनी आफत, लालसोट की गलियों में खतरे का ‘सीधा’ टकराव कब जागेगा प्रशासन?
Voice of pratapgarh News ✍️पत्रकार महेश पीलूखेड़ा
दौसा। लालसोट शहर की सड़कों पर अगर आप बेफिक्र होकर चल रहे हैं, तो संभल जाइए क्योंकि किसी भी मोड़ पर दो सांडों की ‘दंगल’ जैसी भिड़ंत आपके सामने हो सकती है। लालसोट की गलियों में सांडों की लड़ाई अब आम बात हो गई है, लेकिन प्रशासन के लिए ये ‘आम बात’ शायद बड़ी दुर्घटना का इंतजार बन गई है।
बीते दिनों सब्जी मंडी रोड पर दो सांडों की जोरदार भिड़ंत से अफरा-तफरी मच गई। लोग इधर-उधर दौड़ने लगे, दुकानदारों ने शटर गिरा दिए और राहगीरों की सांसें थम गईं। इनकी लड़ाई में कई बार मोटरसाइकिले क्षतिग्रस्त हो जाती है।
हर गली में हैं खतरा, पर जिम्मेदार खामोश: शहर के मुख्य बाजार, अस्पताल के आसपास, मंदिरों के पास और स्कूलों की गलियों में रोजाना ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं। खासकर सुबह और शाम के वक्त जब आवागमन अधिक होता है, तब यह समस्या और भी खतरनाक हो जाती है।
नगर परिषद की ओर से पशुओं की पकड़धकड़ या स्थायी समाधान को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। केवल कागज़ी कार्यवाही और occasional पकड़धकड़ अभियान तक ही सीमित है।
न बच्चों की सुरक्षा, न बुजुर्गों की चिंता: शहर में कई बार स्कूली बच्चों को सांडों की लड़ाई के बीच से गुजरते देखा गया है। बुजुर्ग और महिलाएं डर के मारे घर से निकलने से कतराते हैं।
स्थानीय निवासियों की मांग -हो ठोस कार्रवाई: स्थानीय व्यापारी और रहवासी चाहते हैं कि नगर परिषद जल्द से जल्द आवारा पशुओं के लिए गौशाला या शेल्टर की व्यवस्था करे। साथ ही ऐसे खतरनाक सांडों को अलग कर सार्वजनिक स्थानों से दूर किया जाए।
प्रशासन की चुप्पी चिंता का विषय: सवाल ये है कि क्या कोई बड़ी जान-माल की हानि होने के बाद ही प्रशासन नींद से जागेगा? या फिर जनता को यूं ही रोजाना डर के साए में जीना होगा? निष्कर्ष: लालसोट जैसे व्यस्त कस्बे में जहां आमजन का जीवन सड़कों से जुड़ा है, वहां सांडों की लड़ाई एक मामूली घटना नहीं बल्कि गंभीर खतरा है। अब समय है जब प्रशासन को जागना चाहिए क्योंकि अगली बार ये लड़ाई सिर्फ सांडों की नहीं, किसी मासूम की जिंदगी की भी हो सकती है।



